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राजगढ़ी मंदिर का एतिहाशिक विमोचन

इतिहास

टेम्पल इतिहास
राजगढ़ी माई

बगहा ,नौरंगिया चौराहे से करीब १.५ किलो मीटर की दुरी पर जंगलो के बिच माता राजगढ़ी का दरबार है ! यह एतिहासिक पीठ गौरवमई अतिथ को को खुद में समेटे हुए है ! बताया जाता है की सबसे पहले १२०९ ई० में पटखौली के पाठको के पूर्वज भुवालराम पाठक यहाँ आदि -शक्ति की उपासना करते थे , बाद में बेत्तिया राज ने इस देवी स्थान को करीब सवा पाच एकड. जमीन दी !

वाल्मीकि टाइगर रिजर्ब के जंगलो के बिच इस्थित यह देवी स्थान कई मायने में खास है ! मंदिर के चारो ओर इस्थित खाई कौतूहल पैदा करती है ! गाढ़ी का निर्माण आयताकार ईटो से हुआ है ! मंदिर परिसर में अवस्थित कुआ भी अपने आप में रहस्यमय को समेटे हुए है ! कुए से निकला एक सुरंग कहा जाता है ,यह आज तक कोई जन सका ! हाला की आज तक इस आती प्राचीन गाढ़ी पर किसी पुरातत्व की नजर नही गई है ! कथाओं के मुताबिक वर्षों पूर्व दरबार द्वार (दरुआबारी) ५२ गढ़ी और ५३ बाजारों को कहा जाता था ! इन ५२ गाढ़ी में एक राजगढ़ी भी है ! चम्पारण के इतिहास के अनुसार ४०५ से ४११ ई० में के बिच यहाँ फाह्यान और ६३० ई० से ६४४ के बिच हिन्संग ने दरबार द्वार की यात्रा कर यहाँ के समृद्ध नगर में रहने वाले लोगो की संस्कृति से रूबरू हुए !

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